tag:blogger.com,1999:blog-10933538.post112235828850821665..comments2007-04-16T01:54:04.554+05:30Comments on ~ प्रेमपीयूष ~: प्रेमचंद - 125 वाँ जन्मदिवसPrem Piyushnoreply@blogger.comBlogger7125tag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1150254873287910842006-06-14T08:44:00.000+05:302006-06-14T08:44:00.000+05:30प्रेमचंद का जन्मदिवस याद दिलाने के लिए घन्यवाद। उन...प्रेमचंद का जन्मदिवस याद दिलाने के लिए घन्यवाद। उनकी कहानियाँ दिल में बसी हुई हैं।<BR/><BR/>अनुरागRaaghttp://www.blogger.com/profile/17899437600804420902noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1135478611175327632005-12-25T08:13:00.000+05:302005-12-25T08:13:00.000+05:30like tumbler and tipsy days hopefully we will rema...like tumbler and tipsy days hopefully we will remain in high spirits. well, good daymortgage loanhttp://refinance-mortgage-search.comnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1122634376834850812005-07-29T16:22:00.000+05:302005-07-29T16:22:00.000+05:30मैं कह सकता हूं कि प्रेमचंद की 'गोदान' मेरी पसंदीद...मैं कह सकता हूं कि प्रेमचंद की 'गोदान' मेरी पसंदीदा किताब है. प्रेमचंद का हर शब्द मुझे प्यारा है और उनके आदर्शवाद के तो क्या कहने. लेखन में उनकी कोई सीमाएं नहीं थीं लेकिन समाज में एक लेखक की सीमाओं से क्षुब्ध प्रेमचंद ने अपने इस उपन्यास में बिना आदर्शवादी विकल्प के सीधे-सीधे यथार्थ पेश मुझे चौंका दिया. यह मेरे प्रिय लेखक की अपने आप से बग़ावत थी जो गाहे-बगाहे मुझे आज भी झकझोरती रहती है. <BR/><BR/>हम सब के प्यारे प्रेमचंद के <BR/><A HREF="http://mobilelibrary.cdacnoida.com/bookHindi.html" REL="nofollow">साहित्य का खजाना</A>SHASHI SINGHhttp://www.blogger.com/profile/15088598374110077013noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1122521149243255862005-07-28T08:55:00.000+05:302005-07-28T08:55:00.000+05:30प्रेमचंद की कहानियां यहां पढ़िये:http://www.webduni...प्रेमचंद की कहानियां यहां पढ़िये:<BR/>http://www.webdunia.com/literature/story/<BR/><BR/>इस पृष्ठ के आखिर में है प्रेमचंद की कहानियों की कड़ियाँ।रेलगाड़ीhttp://www.blogger.com/profile/11988701220844256208noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1122478427966784372005-07-27T21:03:00.000+05:302005-07-27T21:03:00.000+05:30प्रेमचन्द जी ने जो भी कुछ लिखा है किसी ना किसी नौक...प्रेमचन्द जी ने जो भी कुछ लिखा है किसी ना किसी नौकरी पर रहते हुवे लिखा है. आश्चर्य होता है जिन्दगी भर अभावो से जुझते रहनेवाला. , घर गृहस्थी मे फंसा हुवा ये लेखक अपनी उच्च कोटी की इन रचनाओ के लिए समय कैसे निकाल पाता था.<BR/>प्रेमचन्द जी ने अपनी रचनाओ मे जिवन के हर पहलु को छुवा है. बचपन के लिए गुल्ली-डंडा, बडे भाई साहब , ईदगाह है, तो बुढापे के लिए बुढी काकी, युवावस्था के लिए तो ना जाने कितनी सारी. <BR/>उन्होने एक ओर प्रेम पच्चीसी लिखि , दुसरी ओर सोज़ ए वतन लिखी. जात-पात ,धर्म अंधविश्वास पर करारी चोट की. उनकी रचना के पात्र देखिये, आज भी आपको अपने आसपास कितने होरी मिल जायेंगे. कितने ही पंडित मोटेराम मिल जाएंगे.<BR/><BR/>लिखने के लिए तो बहुत कुछ है, खाली-पिली मे अगला चिठ्ठा प्रेमचंद के नाम !आशीष श्रीवास्तवhttp://www.blogger.com/profile/02400609284791502799noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1122470107227755962005-07-27T18:45:00.000+05:302005-07-27T18:45:00.000+05:30प्रेमचन्द जी की रचनायें और उनकी शैली सचमुच गजब की ...प्रेमचन्द जी की रचनायें और उनकी शैली सचमुच गजब की है , किन्तु मुझे उससे भी ज्यादा उनकी जीवन-शैली लगी जो अविरल रचनाकर्म और अन्य उद्यमों मे लगी रही ।<BR/><BR/>अनुनादअनुनाद सिंहhttp://www.blogger.com/profile/05634421007709892634noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1122364367754037102005-07-26T13:22:00.000+05:302005-07-26T13:22:00.000+05:30प्रेमचंद की कई कहानियां याद आ रही हैं। नमक का दरोग...प्रेमचंद की कई कहानियां याद आ रही हैं। नमक का दरोगा,ईदगाह,बड़े भाई साहब, गुल्ली-डंडा,पंच परमेश्वर आदि। ईदगाह का पुनर्पाठ किसी पत्रिका में मैंने पढ़ा था अभी नेट पर ही।हामिद जो चिमटा खरीदता है सब शुरुआत में उसकी खरीद का माखौल उड़ाते हैं पर बाद में वह चिमटा सब पर हाबी हो जाता है।आज जब बाजार हमें हमारी जरूरतें बता है तब यह कहानी एक राह दिखाती है कि हम बाजार की चकाचौंध से बिना प्रभावित हुये कैसे अपनी औकात में रहकर जरूरतें पूरी करने का विश्वास बनाये रख सकते हैं।अनूप शुक्लाhttp://www.blogger.com/profile/07001026538357885879noreply@blogger.com