tag:blogger.com,1999:blog-109335382007-09-29T22:11:23.235+05:30~ प्रेमपीयूष ~Prem Piyushnoreply@blogger.comBlogger36125tag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1168935385302663232007-01-16T13:42:00.000+05:302007-01-16T13:47:40.500+05:30पुरूषार्थ और प्रेम<span style="color:#990000;">पुरूष कहलाने वाली एक काया के,<br />झुके कंधे और सशक्त छाती मध्य,<br />छिपा है, एक कोमल सा मुखड़ा,<br />विश्वस्त होंठ कुछ बुदबुदाते हैं ।<br /><br />फिर निःशब्द होंठ, आज गुँथ जाते हैं ।<br /><br />धीमे-धीमे बढ़ते उसके हाथें,<br />गुदगुदाती हूई फिर अंगुलियाँ,<br />श्यामल घटाओं के गजरों में,<br />दिशाहीन बस चलती जाती है।<br /><br />माथे चमकता, ध्रुव सुंदर दिखता है ।<br /><br />मुर्तिकार की थिरकती हैं अंगुलियाँ,<br />आभास कराती है, आज माटी को,<br />उसका अस्थित्व, उभरते आकार ।<br />जीवंत प्रतिमा - यही सत्य है, सुंदर है ।<br /><br />माटी - मुर्तिकार दोनों मोहित हैं ।<br /><br />अनोखी सृष्टि में दो दृष्टि,<br />वादियों में, उसके चंचल नयन,<br />उन पहाड़ियों के मध्य घाटी,<br />बस आज निहारा ही तो करती है ।<br /><br />मनुज मन आह्लादित हो जाता है ।<br /><br />चित्रकार की एक तुलिका,<br />इंद्रधनुषी थाली से रंग लिए,<br />स्पंदन का रंग भरती जाती है,<br />स्पष्ट दिखता तो, बस गुलाबी है,<br /><br />चित्रकार आज पुरष्कृत होता है ।<br /><br />जग को ज्ञान दान देने वाला पुरूष,<br />सारी कवित्व, विद्वता का पाठ भुलकर,<br />क्षणभर हेतु, ज्ञान के नवीन बंधन में,<br />कुछ अपरिभाषित पाठ पढ़ जाता है ।<br /><br />उसका ज्ञान पूर्ण यहीं होता है ।<br /><br />सावन की बाँसुरी सी प्रेरित,<br />मयूर की थिड़कन से कंपित,<br />तीन ताल के अनवरत पलटों तक,<br />शयामल घटाओं में अनुगंजन ।<br /><br />प्रेमभुमि यूँ अनुप्राणित होता है ।<br /><br />अनुशासित अश्वारोही का पराक्रम,<br />पाँच अश्वों का लयबद्ध चाल में,<br />अनुभूति की इस उद्विगन बेला मे,<br />समर्पित - फिर एक विजयी होता हे ।<br /><br />पुरूषार्थ फिर परिभाषित होता है ।</span>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1151760885362153032006-07-01T18:59:00.000+05:302006-07-01T19:06:19.593+05:30कुछ होंठ मुस्काते हैं ।<span style="color: rgb(51, 0, 153);">कुछ होंठ मुस्काते हैं,<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">थिरकते हैं कुछ बातें,<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">बातों में मिसरी घोल,<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">कहते हैं,कुछ अनमोल ।<br /></span><br /><span style="color: rgb(51, 0, 153);">रिश्तों-नातों से परे,<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">बिना कोई बंधन के,<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">बिना वादे-फरियाद के,<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">प्रीत का बस एक डोर ।<br /></span><br /><span style="color: rgb(51, 0, 153);">यूँ ही न आती है यह,<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">तपना पड़ता है उन्हें,<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">तपिश जीवन सहकर,<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">परहित में अब जीते हैं ।<br /></span><br /><span style="color: rgb(51, 0, 153);">छोड़ जाते है अमिट,<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">एक स्फुर्त मुस्कान ।<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">सम्मोहित मानवमन को,<br /></span><span style="color: rgb(51, 0, 153);">उनका स्मरण भी काफी है ।<br /><br /></span>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1124104875645845602005-08-15T10:26:00.000+05:302005-08-15T16:51:15.650+05:30स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ<span style="color: rgb(255, 102, 0); font-weight: bold;">विश्व के प्रत्येक कोने में रहने वाले भारतीयों को, अपनी धरती की स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ । </span><br /> <br /> <span style="color: rgb(0, 153, 0); font-weight: bold;">हम सबका यही प्रयास रहेगा कि अपनी राजनैतिक, सांस्कृतिक, वैचारिक एवं भाषाई स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहे ।</span>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1122753236738165982005-07-31T01:04:00.000+05:302005-07-31T11:54:36.106+05:30आज प्रेमचंद जी का बर्थ डे हैजन्मदिन वाले डिजाइन कार्ड को डाउनलोड होने दें। थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा ।<br /><br /><span style="font-weight: bold; color: rgb(0, 102, 0);">महान कथाकार को हिन्दी चिट्ठाकारों की और से नमन ।</span><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://photos1.blogger.com/blogger/1638/669/1600/premchand.gif"><img style="cursor: pointer;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/1638/669/400/premchand.gif" alt="" border="0" /></a>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1122358288508216652005-07-26T11:04:00.001+05:302005-07-26T13:59:18.520+05:30प्रेमचंद - 125 वाँ जन्मदिवसहिन्दी के कथा-सम्राट प्रेमचंद के 125 वाँ जन्मदिवस ( 31 जुलाई) के अवसर पर विश्व के कोने-कोने में फैले हिन्दी ब्लागर, अपने-अपने आसन पर बैठे ही आपस में छोटा-मोटा कुछ आयोजन कर सके तो कैसा रहेगा ।<br /><br />हमारी सरकार, प्रेमचंद के जन्मग्राम लमही, जो कि वाराणसी के पास है, में वर्षभर चलने वाले कार्यक्रम आयोजित करने जा रही है । यों लखनऊ और गोरखपुर में भी क्रार्यक्रमों की तैयारियाँ चल रही है । चले भी क्यों नहीं, प्रेमचंद ने जीवन के कुछ वर्ष जो यहाँ भी बिताए थे ।<br /><img src="http://i20.photobucket.com/albums/b243/prempiyush/premchand.jpg" alt="प्रेमचंद" align="right" hspace="4" vspace="4" /><br />लेकिन लमही में उपस्थित होंगे सैकड़ों साहित्यप्रेमी जिनमें होंगे राजेन्द्र यादव , नामवर सिंह, दूधनाथ सिंह, श्री लाल शुक्ल आदि । वहाँ के भव्य सरकारी कार्यक्रमों में मुलायम सिंह यादव एवं सूचना एवं प्रकाशन मंत्री जयपाल रेड्डी की सरकारी घोषणाएँ भी होंगी । कितनी घोषणाएँ पूरी होंगी कितनी पेन्डुलम की तरह लटकेगी , यह तो कालचक्र ही बताएगा । यूँ संभावित घोषणाएँ हैं, एक राष्ट्रीय स्मारक और मुंशी प्रेमचंद शोध एवं अध्ययन संस्थान की स्थापना । लेकिन आवश्यक प्रकियाएँ है - सरकारी घोषणा, भवन निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण, राशि आवंटन, फिर उस आवंटन में केन्द्र और राज्य सरकार का अंश, सबसे महत्वपूर्ण है इन सबके लिए दफ़्तरो की साहित्यिक पेपरयात्रा जो कि पैसेंजर ट्रेन की तरह सरकती है । इन कामों के लिए ठेका किसको मिलेगा यह तो भीतरी बात है । अगर प्रेमचंद का <a href="http://mumbaiblogs.blogspot.com/2005/07/blog-post_112176709746156309.html">प्रेमकंद</a> बन जाए तो आश्चर्य काहे का ।<br /><br />इस अवसर पर हमलोग असरकारी रूप से महान कथाकार को कुछ याद करें, कुछ उनके लेखों को छुएँ, कुछ उनके जीवन को झाँके, कुछ पढ़े , कुछ कड़ियाँ दें तो शायद आप लोग मुझसे राजी होंगे ।<br /><br />मित्रगण, मैं भी आपकी तरह ही प्रेमचंद की कहानियों एवं उपन्यासों का दीवाना हूँ, जो समकालीन हिन्दी साहित्य एवं समाज का आइना है।<br />आइए न, इस आइने में हम हिन्दी प्रेमी आपस में बहुत साहित्यिक चर्चा न ही सही, कुछ गपशप ही करें ।Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1121434521390893942005-07-15T19:03:00.000+05:302005-07-15T19:06:41.266+05:30चिट्ठाकार मंडली नमो नमः ।<span style="color: rgb(0, 0, 102);">ब्लाग कहो या चिट्ठा ,खट्टा हो या मीठा </span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">सुलेख हो या कुलेख, मिले तालियाँ या गालियाँ ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">जो मन में आये लिखो, सीखो या सिखाओ</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">मुफ्त़ में मेरे जैसा कवि-लेखक बन जाओ ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">देशी बोली में कुछ सुनाओ, हम सब दोपाया जन्तु हैं </span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">यहाँ भी कई दल हैं, अच्छे-भले और चपल तन्तु हैं ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">जय रामजी की, अपनी तो एक ही तसल्ली है</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">अनिर्मित सेतु बनाने को, हमारी एक बानर टोली है ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);"> चिट्ठाकार मंडली नमो नमः ।</span>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1121110858924392772005-07-12T01:08:00.000+05:302005-07-12T19:32:24.383+05:30और नज्म़ जिन्दा रह गये<span style="color: rgb(0, 51, 51);">जिन्दगी थी, मस्ती भी थी,</span><br /><span style="color: rgb(0, 51, 51);">दौलत थी, इक गश्ती भी थी ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 51, 51);">इक जवानी थी, रुबाब भी था,</span><br /><span style="color: rgb(0, 51, 51);">दिवानी थी, इक ख्वाब भी था ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 51, 51);">हँसती गलियों में नकाब भी था,</span><br /><span style="color: rgb(0, 51, 51);">रंगीनियों का इक शबाब भी था ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 51, 51);">जुमेरात शायद वह आबाद भी था,</span><br /> <span style="color: rgb(0, 51, 51);">जुम्मे के रोज़ वह बरबाद भी था । </span><br /> <br /> <span style="color: rgb(0, 51, 51);">उस शाम साक़ी भी साथ न था ,</span><br /> <span style="color: rgb(0, 51, 51);">दो नज्म़ ग़ज़लों का बस याद था ।</span><span style="color: rgb(0, 51, 51);"> </span>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1120925668216803112005-07-09T21:41:00.000+05:302005-07-09T23:35:42.406+05:30कविता की अर्थी<span style="color: rgb(51, 102, 102);">नून-तेल के दायरे से </span><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">निकली जब जिन्दगी ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">माल असबाब भरे पङे थे</span><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">भविष्य के गोदामों में ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">महफिल की वाह वाही से</span><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">थके थे कान वहाँ पर । </span><br /><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">टकटकी लगा अब भी</span><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">चाँद को देख रहा था ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">कल की दिनचर्या बुनकर</span><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">आखिर जुलाहा सो गया ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">मस्जिद में बस नमाज पङी थी</span><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">इधर सपने में वह चीख पङा ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">देखा , कलमों के सेज</span><br /><span style="color: rgb(51, 102, 102);">पर कविता की अर्थी थी ।</span>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1120126759041175852005-06-30T15:31:00.001+05:302005-06-30T16:33:47.496+05:30फरमाइशी गीत - लघु कहानीकैपिटल एक्सप्रेस की सात नंबर स्लीपर में सेठजी का पुरा परिवार जा रहा था । उनलोगों का मस्त फिल्मी गीतों के अंत्याक्षरी दौर चल रहा था जो फिर एकाएक रुक गया । उसी डब्बे में एक अंधा बाबा गाना गाकर भीख माँग रहा था, जो अपना राग अलापते हूए वहाँ पहूँच गया । उसकी आँखें की पुतलियाँ सफेद पत्थर सी थी । पान खाये हूए लाल-काले दाँत बाहर की ओर निकले हूए थे । बाबा के हाथ में बंधी दो घुँघरु, डफली और ताल सब घिसे-पिटे लग रहे थे ।<br /><br />गीत के इसी माहौल को जारी रखते हूए सेठ के बङे लङके ने कहा - "बाबा एक बढिया गाना सुनाओ, बैठो यहाँ" - उसके लिए सीट पर एक जगह भी बना दी । बाबा गीत के इस माँग को नहीं समझ पाया ।<br /><br />"बाबा दो रूपया दूँगा, दिल खुश करनेवाला कुछ गाना सुना दो, पुराना भी चलेगा "- उसने विकल्प दे दिए ।<br /><br />"का गाऐं, हमको बहुत गाना कहाँ आता है ।" - बाबा ने मजबुरी जाहिर की ।<br /><br />"जो तुमको अच्छा लगता है , बढिया वाला कोई गा दो "- फरमाइशी गीत की माँग पुरजोर हो गयी । सबकी आँखे उसकी और बङी बेसब्री से देख रही थी ।<br /><br />चलती रेलगाङी की अनवरत आवाज में भी एक चुप्पी थी गाना सुनने के लिए । गले को साफ कर वह गाना गाने के लिए वह शुरू ही हुआ कि जोर से गाने की हिदायत आयी किसी कोने से ।<br /><br />उसे भी एक कद्रदान मिल गया था , फिर फरमाइशी गीत का माँग भी तो पुरा करना था । वह पुरे ट्रेन में गाया हुआ वही रटा-रटाया दो लाइना गाना फिर जोर-जोर से दुहराने लगा -<br /><br />" तुम गरीब की सुनो वह तुम्हारी सुनेगा ,<br /> तुम एक पैसा दोगे वह दस लाख देगा ।"<br /><br />दुबारा गीत की फरमाइश न कर , बङे लङके ने दो रूपये का सिक्का निकालकर उसके हाथ में रख दिए ।Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1119638854058643142005-06-25T00:09:00.000+05:302005-06-25T01:08:53.536+05:30छिपा है बचपन<span style="color: rgb(0, 0, 102);">कैसे कहूँ मैं</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">बचपन छिपा है</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">मेरा अभी भी ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">खेलता रहा</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">यौवन के घर भी</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">छोरा मुझमें ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">मिलते रहे </span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">बचपन के मीत</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">गले लिपट ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">भींगता रहूँ</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">निज आँगन मैं</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">बरसातों में ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">खेलना चाहूँ</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">मैं सङक किनारे </span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">बच्चों के गेंद ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">लुढ़काता हूँ </span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">नजरें बचाकर </span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">रास्ते के गिट्टी ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">झुलते आमों</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">को लपक लूँ फिर</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">बीच बगिया ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">नदी तट मैं</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">फिर कुद पङता </span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">वही झपाक । </span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">छिपता रहूँ</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">अपनों से मैं अभी</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">पीछे धपाक ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">कुट्टी करूँ मैं</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">अगले दिन फिर</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">हूई जो दोस्ती ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">है बचपना </span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">अनमोल जो मेरा</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">यहाँ सलोना । </span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">बङा हो जाए</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">कोई, छोटा ही रहा</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">माँ-बाबुजी से । </span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">चढते जाते</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">पचपन सीढियाँ </span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">बचपन से ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">दौङती जाती</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">ललाट की लकीरें</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">चिंता फिक्र में ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">कहाँ छिपता </span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">उनका बचपन </span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">दिख जाता है ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">एक सबेरा</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">बचपन निखरा</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">नाती के संग ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">फिर से वही</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">प्रेम की छाँव माँगे</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">बचपना सा ।</span><br /><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">( नानी-माँ को सादर समर्पित )</span><br /><span style="color: rgb(0, 0, 102);">-- प्रेम पीयूष </span><br /><br /><a href="http://prempiyush.blogspot.com/2005/06/blog-post_17.html"><span style="color: rgb(0, 153, 0);font-size:85%;" >यह हायकू कविता रंगीन लिखावट में यहाँ देखें ।</span></a>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1118721081013542452005-06-14T09:15:00.000+05:302005-06-15T16:59:54.053+05:30सोच-समझकर अब जीना हैहृदय के भाषा कैसे मैं जानूँ,<br />खुश हो तुम, कैसे मैं मानूँ ,<br />कैसे कहूँ, कैसे ये रैना बीती,<br />कैसे कहूँ वो हारी या जीती ।<br /><br />सोच-समझकर अब जीना है।<br /><br />चुप रहना ही ठीक था बंधु,<br />दिखता था हृदय तेरा सिंधु,<br />बस तभी तो मैंने गाया था,<br />विश्वास करो, न गाऊँगा अब ।<br /><br />सोच-समझकर अब जीना है।<br /><br />पता नहीं था वीणा के झंकार,<br />स्वरलिपि के वे सप्तक तार,<br />मंद्र सप्तक हो जाऐंगे तीव्र सप्तक ,<br />न अब वीणा है, न गाना है ।<br /><br />सोच-समझकर अब जीना है।<br /><br />पता नहीं क्यों ऐसा लगता,<br />एक भय का संदेशा फिर आता,<br />नदी मेरी नहीं, न मेरी धारा,<br />इसकी गति है, इसे बहना है।<br /><br />सोच-समझकर अब जीना है।<br /><br />भावों के धार में बहना नहीं,<br />सीख कठिन है अपनाना भी,<br />मनुजपुत्र को क्यों नैया खेना है,<br />डुब जाने से तो भला डरना है ।<br /><br />सोच-समझकर अब जीना है।<br /><br />अगर प्रेम की भाषा है अपराध,<br />हाँ , मैं चिर क्षम्य अपराधी हूँ,<br />कहूँ, यही मेरी एक अक्षुण्ण संपत्ति से,<br />असहायों के सुश्रुषा का व्रत पुरा करना है।<br /><br />सोच-समझकर अब जीना है।<br /><br />जीवन तो एक सीख है मित्र,<br />मरना भी कहाँ हमने सीखा है,<br />एक बात कहूँ, अगर मान लो तो,<br />पल-पल मरना कभी अच्छा नहीं ।<br /><br />सोच-समझकर अब जीना है।Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1118524253807772662005-06-12T02:32:00.000+05:302005-06-30T16:28:01.616+05:30११वीं अनुगूँज- माज़रा क्या है?मुझे बङी खुशी हूई जब अनूप जी ने इस अनुगूँज के लिए लिखा -- भाषा:- जिसमें आप लिख सकें । भाषाई दीवारों का एक माज़रा साफ होता दिखा ।<img style="color: rgb(0, 0, 102);" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" alt="Akshargram Anugunj" align="right" hspace="5" vspace="5" /><br /><br />इस बार के अनुगूँज का विषय पर स्वामीजी की शैली में आपुन का मन करता है कि लिख डालूँ कि मुज़रा कैसा है । जिसमें नेताओं के चुनावी गीतों में नंगी जनता नृत्य करती है । चाटुकार ढोल बजाते हैं । इसी माहौल से दूर , कुछ मज़दूर फावङा लेकर डालर के खान में पैठ कर गये है , दे- दनादन समेट रहे है झोले में । मगर मेरे को तो मन करता है कि आशा ही जीवन है पर पुनर्बहस प्रारंभ कर दूँ और माज़रा के तह में जाकर खोज-बीन करूँ ।<br /><br />विषयवस्तु को जरा तटस्थ नजरिये से देखें तो यह आशावादी और निराशावादी विरोधाभास किसी भी भौगोलिक इकाई और कालखंड में दृष्टिगोचर होगा । अब यह चिंतनशील मस्तिस्क पर निर्भर करता है कि वह किस तरह से सोचता है । और सोचने का यह ढंग उसके सामाजिक – आर्थिक परिवेश से संचालित होता है ।<br /><br />भारतीय परिपेक्ष्य में हमारी अपनी पहचान सदियों पुरानी है । मगर अब थोङा सोचना शुरु करें आजादी के बाद से , जब से इंडिया नाम की अवधारणा उत्पन्न हुई, और हमारे सोच पर हावी भी होती चली गयी । एक वैचारिक विरोधाभास का उदय हुआ, घुंघट में लिपटी भारत माता और खुले बाजार में बिकती मेड इन इंडिया के बीच। हिन्दुस्तान की अपनी सलज्ज संस्कृति और पश्चिम की खुली संस्कृति के बीच । गाँव के हाट बाजार और विश्व बाजार के बीच । कारण तो कई हैं मगर एक स्पष्ट है मेरे सामने , हमारे गिरगिटिया रंगों के खद्धरधारी नेताओं में दूरदर्शिता की भारी कमी । आखिर विदेशी दुकानदार, वामपंथी धक्का-मुक्की के बाद अपनी दुकान लगा ही दिँए । दो-चार जो नेता ठीक-ठाक भी हैं , बाकी की हल्ला पलटन को संभालने में काफी उर्जा बेकार कर रहे हैं । आख़िर करना तो उन्हें भी वही पङता है जो बुद्घिवर्ग काफी पहले से कहते रहते हैं । चाहे विदेशी निवेश की बात हो या सर्वशिक्षा अभियान या सी-डेक के हिन्दी कंप्युटिंग की प्रयासों को निःशुल्क करना हो । बस दूरदृष्टि की अभाव में , अनूपजी माज़रा यहीं अटक जाता है । जिसका खामियाजा हमारी जनता को भुगतना पङता है ।<br /><br />हमारे इंडिया साईनिंग की बोर्ड जमीन पर धूल चाटती नजर आती है । इस बोर्ड के टुटे टीन को कुछ बच्चे पा जाने के आतुर रहते हैं जिसे उनके झुग्गी-झोपङे के टुटे किनारे पर लगाया जा सके । अशिक्षितों की टोली से उभरते हैं छोटे मोटे नेता, असंतुष्टि का आक्रोश , क्षेत्रवाद की अवधारणा । और इधर छोटे शहरों के मामलों में लोग प्रारंभिक समस्याओं जैसे बिजली, पानी, आवास में इतने उलझे रहते हैं कि वैश्विक स्तर पर सोचना बेवकुफी प्रतीत होता है ।<br /><br />कुछ लोगों को फिर जब बुद्घि आयी तो हम भी बाजार बनाने में लग गये । अपनी कारीगरी बाहर वालों को भी पसंद आने लगी। अपने लोग कुछ स्वदेश तो कुछ परदेश में ही मेहनत से झंडा गाङ कर जन-गण-मन की धुन बजाने लगे । मेहनती और भी मेहनत कर पैसा कमाने की सोचते हैं चाहे कमाने की जगह विदेश हो या स्वदेश । जुझारु निकल पङते है किसी अनजानी राह पर , किस्मत आजमाने के लिए । उन्हें समय कहाँ कि दुसरों का दोष-गुण निकालते फिरें । लेकिन माज़रा रह जाता है कि गाँव की स्कुल में चार टूटी कुर्सियों को बदलने की जिम्मेदारी क्या कमाऊ छात्र या मास्टर नाम के किसी सरकारी नौकर की है ।<br /><br />कुछ लोगों की राजनीति की यात्रा हो या पारिवारिक ट्रेन की यात्रा , सीट रिजर्व है , सो उनकी है , सो खा रहे है गैरकानुनी भेंडर की मुंगफली । खाया और गिरा दिया छिलका ट्रेन के फर्श पर । सीट उनकी है मगर फर्श तो सबका है न, यह बात बहुतों पढे लिखे को भी गवारा नहीं है । माज़रा है कि सोच विस्तृत होनी चाहिए । मगर यह बात प्रायोगिक तौर पर और भी जिम्मेदारीपूर्ण हो जाती है जब कि सोचनेवाला आर्थिक एवं सामाजिक रुप से संबल है । मानसिक संबलता भी अगर साथ हो जाये तो फिर क्या कहने । फिर तो डर काहे का ।<br /><br />गाँव में ठंडा मतलब कोका-कोला से लस्सी की ठंडक थोङे ही कम हो जाएगी । चाहो तो आप भी लस्सी के स्वाद को डब्बे में बंद करके बेच दो । विश्व मेरा गाँव है , यही मेरा बाजार है । आधार सही रहे तो बस आत्मवत् सर्वभूतेषु की माज़रा है । स्वंय की शक्ति को पहचाने बिना दुसरे के पाँव खींचना कोई बुद्धिमानी थोङे ही है ।<br /><br />फिर भी संचार क्रांति के कारण अनामंत्रित रुप से विश्वव्यापी विविधताओं में एक समानता सी आ रही है । यह परिवर्तन मुख्यतः दिख रहा है समाज के उस वर्ग में , जो इस क्रांति में सक्रिय या असक्रिय रूप से भाग ले रहा है । हम ग्राहकों की नब्ज की पकङ भी बङी आसान है । करोङो जनसंख्या के पास करोङों मिनट हैं बेकार के । क्योंकि सास भी कभी बहु थी इसलिए देशी-विदेशी चैनलों बखुबी दिखा रही है घर-घर की चुगलकहानी । रिमोट के लिए झगङा फिर शुरू कयोंकि घर के मालिक परेशान हैं राजनैतिक चर्चा सुनने के लिए । यह मत भुलिए कि ठीक उसी समय हो रहा है क्रिकेट का टेस्ट मैच , सो देश के कर्णधार टी वी के पास से उठने को तैयार नहीं । आखिर देश के हार जीत का प्रश्न है । मशीनीकरण के भाग्य विधाता , गोरे शासक, दोनों देशों के बीच चाहरदीवारी खङी कर, दोनों भाईयों को खेलने के लिए क्रिकेट का बल्ला दे गये । बेटा आपस में ख़ुब खेलता रह और फिर लङता रह । यह रिमोट तो बस नमुना है देश के रिमोट का । इसी तरह दिन पर दिन बीत गये । हमारी दीन-हीन जनता के लिए सही सोच का समय नहीं निकल पाता है ।<br /><br />अब इस निरीह जनता को सिर्फ दोष देना बुद्धिमानी नही होगी , आखिर हरेक मनुष्य के मस्तिस्क को भी कुछ चाहिए न, उसका स्वभाविक खुराक , उसकी दुसरों द्वारा आदर की माँग । और यह आती है कुछ जिम्मेदारियों के निर्वहन से । यह नहीं हो पा रहा है देशवासियों में यहाँ । और यहीं गलती हो रही रही है हमसे और माज़रा नाटकीय होता जा रहा है ।<br /><br />तब उपाय एक ही है , प्रत्येक स्तर पर परिश्रमी को प्रोत्साहन चाहिए । रुढ़ीवादी विचारधाराओं का परिष्करण चाहिए । अब समय , भौगोलिक क्षेत्र और विचारों की सीमाएँ बदल गयी है । सारा विश्व एक गाँव बन रहा है । चाहो तो महाजन से सुद पर रुपये लो या फिर निकल पङो कमर पर गमछा बाँधकर अपने हाथ जग्गनाथ मानकर । अक्षरग्राम के चौपाल पर कुछ कहो । कुछ पुचकारो अगर सही रास्ते हमारी साईबर बैलगाङी चल रही है तो । अगर गलती भी हो रही है तो दया का पात्र भी मत बनाओ । कुछ करो अपने लिए , अपनों के लिए । अगर नहीं कर पा रहे और उच्चासन की तुम्हारी कुर्सी से कुछ सही रास्ता दिखता है तो वही बता दो । विचारों के मध्य पारदर्शिता और समर्पँण का अभाव ही माज़रा है , वरना कमोवेश दोनों अपनी- अपनी जगह सही है ।<br /><br />डरो मत कि क्या मैं का अस्थित्व समाप्त होता जाएगा इस तरह से । पचपन साल से उपर हो गये आजाद हुए और हमारी अपनी पहचान बनाए रखने के प्रयत्न में हम सफल हैं । इसी छोटे से अनुभव से हमें लग रहा है कि हमारी भारतीयता की मुलभूत पहचान नहीं खो रही है । और इसका कारण है हमारी विभिन्न संस्कृतियों को आत्मसात् करने की विलक्षण क्षमता । परिवर्तन संसार का नियम है । देश-काल भी क्या अछुता रह सकता है । ज्ञान एवं शक्ति का समन्वक उपयोग किसी लघु ईकाई पर भारी पङता है । और इसी तथ्य के कारण, परिवर्तन के लिए प्रभावी देश अन्य छोटे देशों का भाग्य निर्णय करते हैं । हमारे पास ज्यादा पैसा नहीं है , सही तरीके से पैसा कमाने में बुराई क्या है । हमारे पास तकनीक नहीं है , अभी यही थोङी कमी रह गयी है । आधी जनसंख्या की भी सक्रियता को सुनिश्चित करो , काम आसान हो जाएगा । माज़रा बहुत गंभीर होने से पहले ही वातानुकूलित मिटिंग में निर्धारित करो करो तपती धूप में पसीना बहाने वाले के लिए कितनी सरकारी दर से मजदुरी मिलनी चाहिए । इधर माता के संतान, मत मारो कन्या भ्रुणों को , कल कन्याओं की भारी कमी हो जाएगी तो उलटा दहेज देकर खुशामद करते रहना होगा ।<br />माज़रा है कि दुनिया गोल है । यूँ कहें कि ये माज़रा ही गोल-मटोल है । सोचते जाओ उलझते जाओ । उलझन से बचने का उपाय एक ही है । दिलो-दिमाग से सोचो और बढते रहो आत्मा की पुकार पर । कोई भी परेशानी झट से सुलझ जाएगी ।Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1117571220432233632005-06-01T01:35:00.000+05:302005-06-30T16:31:09.303+05:30एक ब्लाग या पाती ।एक ब्लाग या पाती ।<br /><br />चिट्ठी की हुई विदाई,<br />चिट्ठा से हुई सगाई,<br />भावों के ससुराल चली,<br />ले भानुमती की पिटारी,<br /><br />एक ब्लाग या पाती ।<br /><br />मुक्त आकाश के तले,<br />अदृश्य तंतुओं से जुङे,<br />सहस्र आँखे फिर यहाँ,<br />अपनापन लिए पढती हैं,<br /><br />एक ब्लाग या पाती ।<br /><br />लेखनी के प्रवाह से,<br />कुंजीपटल पर स्पंदित,<br />अनवरत इन पन्नों में,<br />स्वतंत्रता की अभिलाषी,<br /><br />एक ब्लाग या पाती ।<br /><br />समाज का दर्पण यह,<br />वैचारिक चपल चौपाल,<br />बिना किसी लाग-लपेट,<br />लिखते हैं स्वजन,<br /><br />एक ब्लाग या पाती ।<br /><br />मिलकर बातें करें हम,<br />अंतिम अनावरण से पहले,<br />बिना आवरण के जब लिखे,<br />शाश्वत हो जाती है फिर,<br /><br />एक ब्लाग या पाती ।<br /><br />ह्रदय के वाद्ययंत्र को<br />यहाँ कलम के कलाकार,<br />क्या खूब बजाते हैं, फिर<br />मिलकर एक नाम देते हैं,<br /><br />एक ब्लाग या पाती ।<br /><br />अनजानों से डरकर भी,<br />विश्वास की ही आशा में,<br />स्थापित करते हम संवाद,<br />मिला अनोखा माध्यम है,<br /><br />एक ब्लाग या पाती ।<br /><br />लेखनी की स्याह होती<br />आँसू की अनवरत धारा,<br />आप हमारे संग होते है,<br />लिखते है सांत्वना की,<br /><br />एक ब्लाग या पाती ।<br /><br />विचारों की कुछ ऐसी लहरें,<br />क्षण या जीवन भर के लिए,<br />एक बंधन में बाँधते, जैसे<br />अनजान नाविकों का यात्रा,<br /><br />एक ब्लाग या पाती ।Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1115802681378349612005-05-11T14:33:00.000+05:302005-07-03T18:39:08.016+05:30अनुगूंज 10 – एक पाती सिन्दुरिया के नामप्रिय मित्रों,<br />रविजी का <a href="http://www.akshargram.com/2005/05/11/422/">आमंत्रण </a>आज रवि के सिन्दुरिया किरणों में दिखा । वो भी ठीक उस समय जब प्रभात किरणें आम के पेङ की कोपलों पर पङ रही थी । एक-एक डाल, पात सब सिन्दुरिया रंग में रंगे थे। सिन्दुर का नाम लेते ही, किसी नवेली दुलहिन की सिन्दुरिया माँग याद आ जाती है । जब शादी की सुबह सिन्दुर भरे माँग में नारी, सौन्दर्य एवं ममत्व की साक्षात् प्रतिमा जान पङती है । नव दम्पत्ति के सिन्दुरी सपने, उन्हें क्षितिज पर तैराती भी रहती है । <br /><a href="http://www.akshargram.com/2005/05/11/422/"><img alt="Akshargram Anugunj" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" align="right" hspace="5" vspace="5" /></a><br /><br />अभी इतनी दूर क्षितिज पर न जाकर बस दस मीटर की दूरी पर स्वतः उगे हुए आम की छाया में चलें । हमारे घर के सामने एक छोटी सी फूलों की बगिया है । आठ-दस साल पहले उसी के दूर कोने में फेंके गये आम की गुठलियों से काफी पौधे उग आये थे । भूगर्भ से आम के उन नन्हें पौधों की गुठलियों से साबुत गरी निकालकर मैं उसका एक कोना पत्थर पर घिस लेता । बस बन जाती थी सीटी हमारी । पैं – पों वाली सीटी को कमरे में बजाने से माँ को काफी चिढ थी । तब से सीटी बाहर ही बजने लगी । इसी सीटी की आवाज में बढने लगा, एक आम का पौधा जिसको मैनें उखाङ कर सीटी न बनायी थी ।<br />फिर चला गया मैं बाहर पढने के लिए। पढाई के दौरान उस आम के पौधे के साथ संपर्क टूट गया । फिर तो उस पौधे की डालियाँ बढकर छोटा छितरैया पेङ भी बन गयी । करीब दो साल के बाद एक दिन बगान की सफाई के दौरान , पिताजी को मैंने कहा कि इस गुठली से उगे आम के नन्हे पेङ को काट क्यों न दिया जाए । यह आम का पेङ बङा होकर अपने छाँव से पुरा बगान ही लील लेगा, मैं फिर फूल के पौधे कहाँ रोपूँगा , आवारा गुठली वाले आम का फल क्या मीठा होगा । वो मेरी बात को अनमने ढंग से सुन रहे थे । क्योंकि वृक्षप्रेमी पिताजी का अगर बस चले तो हमारे पुरे घर के परिसर को वन-विभाग में बदल दें । मेरे तर्कों पर पिताजी कहने लगे कि यह संभवतः सुरजापूरी आम का पेङ होगा । सुरजापूरी आम हमारे इलाके का मध्यम आकार का खुब मीठा आम होता है । पुनः मेरे अनुरोध पर कहने लगे कि सिर्फ एक साल इसका आम देख लेते हैं, अगर बीजु जैसा खट्टा हुआ तो काट देना । कहकर उन्होनें जङ की मिट्टी को फिर ठीक कर दिया और लटकते डालों को बाँस की कमाची से खङा कर दिया ।<br /><br />दिन बीतने लगे, धूप, वर्षा की मार को सहकर वह छोटा पेङ भी बन गया । एक वसंत उसमें मुकुल भी आए । कोयल की कुहू - कुहू भी सुनाई पङने लगी । पानी डाला जाने लगा उसके जङ में। फल क्या होगा पता नहीं मगर पिताजी कहीं से लाकर दवाईयों का छिङकाव भी कर गये । मंजर से टिकोले , फिर टिकोले आम में परिवर्घित हुए । अब यह आम अपने बङे आकार के कारण न तो मध्यम आकार के सुरजापूरी जैसा देखने में लगता था , न ही छोटका बीजु जैसा । पहरेदारी होने लगी आम की । कभी दूसरों का आम झटकने वाला मैं उस्ताद , अपने आमों को किसी बाहरी आदमी को छुने भी नहीं देता ।<br /><br />अब इन आमों का रंग सिन्दुरी होने लगा। एकाध पककर टपक गये। धरती माँ की संपत्ति को पेङ ने प्रसाद स्वरुप प्रदान किया । फिर भी हमारे घर की रीति के अनुसार भगवान को प्रसाद चढा कर हम सबने उस आम को चखा। कभी कभी नियमित पकवानों को जब पूजा-पाठ के ख्याल से पकाया जाता है तो उसका स्वाद दुगुना हो जाता है । मगर पूजा में चढे आम का मीठापन पेङ के बाकी आमों में भी बना रहा । आमों का स्वाद तो काफी मीठा है ही, सुरजापूरी का स्वाद से यह स्वाद कुछ विशिष्ठ भी है । चार साल हो गये इस प्रसंग के । आसपास के पेङों में आम आये न आये इस सिन्दुरिया का आँचल खाली न जाता है । आजकल लदा पङा है यह आमों से , पिताजी भारी हो रहे डालों को बासों के दर्जन भर सहारे से टिकाये हैं । अब तो इसे काटने का याद पङते ही देह सिहर जाता है । बहुत पहले जब वह छोटा ही था, ठीक उसके जङ के पास घर की नियमित चाहरदीवारी भी खङी करनी पङी थी। मगर पंचफुटिया चाहरदीवारी से परे, आजकल सङक पर वह बच्चों के लिए कच्चे ही सही मगर वह कुछ आम टपकाता ही रहता है ।<br /><br />सिन्दुरिया की प्रेरणा उन हजारों आवारा गुठलियों के लिए भी है , जिन्हें संरक्षण चाहिए विकास के लिए । जिनमें अधिकतर खट्टे बीजु हो सकते है परन्तु बाकी थोङे को भी अगर अपनी क्षमताओं एवं प्रतिभाओं को दिखाने का मौका मिले तो परिणाम बेहतर होंगे । आवश्यकता है तो कुछ वृक्ष प्रेमियों की ।<br /><br />आपका,<br />प्रेम ।Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1115423930943389352005-05-07T05:25:00.000+05:302005-06-30T16:49:33.133+05:30विश्वास का एक आवरणजिन्दगी की खुली किताब के<br />श्वेत-श्याम उन पन्नों को,<br />मौसमी बयारों से बचाता है<br />विश्वास का एक आवरण ।<br /><br />अनजानी राहों का मुसाफिर<br />गलियों से जब गुजरता है,<br />फीकी हँसियों से बचाता है<br />विश्वास का एक आवरण ।<br /><br />मैखाने का खनकते प्यालों ,<br />धुमिल चेहरों के धुँए के बीच,<br />अनास्क्ति की चादर ओढाता<br />विश्वास का एक आवरण ।<br /><br />राही जब थकने लगता है,<br />सराय जब पास बुलाता है,<br />शक्तिपुंज सा न रुकने देता<br />विश्वास का एक आवरण ।Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1115022493063916382005-05-02T13:44:00.000+05:302005-05-02T14:35:23.520+05:30गुरु दक्षिणा<p style="color: rgb(0, 0, 102);" class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">एकलव्य सा सीखा है मैनें,<br />कलम एक दिन यहाँ पकङना,<br />शब्द बाणों में फिर धार करना,<br />पहले तरकश मेरी खाली थी ।</span><span style=""><o:p><br /></o:p></span></p> <p style="color: rgb(0, 0, 102);" class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">अपनी लेखनी की सुर्ख स्याही से,<br />तुम भरते जाना इन पन्नों को -<br />यही ज्ञानदा ने तुझसे कहलाया ,<br />जब कलम पहचान चाहती थी ।</span><span style=""><o:p><br /></o:p></span></p> <p style="color: rgb(0, 0, 102);" class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">सैकङों आँखों के इन पन्नों पर,<br />तथ्य, भावों के ज्ञान-सागर से,<br />चुने मैनें वे बिखराये मोती ही,<br />तुमने जो बारंबार छितराये थे ।</span><span style=""><o:p><br /></o:p></span></p> <p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;"><span style="color: rgb(0, 0, 102);">मैं भी जलाऊँ कुछ दीप यूँ ही,<br /></span><span style="color: rgb(0, 0, 102);">और दक्षिणा में क्या दूँ मैं भी ।<br /></span><span style="color: rgb(0, 0, 102);">या माँग ले मेरा अँगुठा फिर तू ,<br /></span><span style="color: rgb(0, 0, 102);">द्रोणाचार्य ने कभी जो माँगा था ।</span> </span><span style=""><o:p></o:p></span></p>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1114848207451114122005-04-30T13:29:00.000+05:302005-04-30T13:33:27.453+05:30रुपहली – कहानियाँ<p style="color: rgb(51, 51, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">देख रही थी आँखे वही कहानी</span><span style="">,</span><br /><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">जाने कैसे सुना रही थी जुबानी,<br />वही राजा, वही रानी, वही कहानी,<br />आँखे नम थी या हवा की नमी ।</span><span style=""><o:p><br /></o:p></span></p> <p style="color: rgb(51, 51, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">राजा के महलों में, हँसते सपने,<br />रचे थे कुछ खुद तो कुछ औरों ने,<br />तभी तो दूर से दिखते थे अपने,<br />कुछ बाँटा हँसी, तो कुछ दुखों ने ।</span><span style=""><o:p><br /></o:p></span></p> <p style="color: rgb(51, 51, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">उन्हीं कहानियों पर क्यों जाती आँखे,<br />मन की कङियाँ क्यों जाती है बँधने ,<br />क्या जिन खोजा तिन पाईंया कहने ,<br />या सुखांत होने की आस रखे मन में ।</span></p>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1114545872058275632005-04-27T01:29:00.000+05:302005-04-27T01:34:32.060+05:30आँसु की तीन बूँदे ।<p style="color: rgb(102, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">पुछो उससे, जिसका अपना आज नहीं आया,<br />देखो उसे, रात भर जिसने आँखे बिछाई हैं ,<br />बैठो वहाँ, जहाँ पुतलियाँ न हिलती हो ,<br />सिर्फ गालों पर आँसु नहीं, ठंडी ओस की बूँदें है।</span><span style=""><o:p><br /></o:p></span></p> <p style="color: rgb(102, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">गर्म चेहरे पर, अकेलेपन के साथी वे,<br />बूँदें खुद ही आती हैं, अपनापन लिए,<br />भरी आँखों के झरने से अनवरत बहती,<br />वे टपकती आँसु नहीं, एक शीतल नहान है । </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p class="MsoNormal"><span style="color: rgb(102, 0, 0);"><o:p> </o:p></span><span style="font-family: Mangal;" lang="HI"><span style="color: rgb(102, 0, 0);">देखा है, पाषाण ह्रदय भी जब दुःखी होता है,</span><br /> <span style="color: rgb(102, 0, 0);">पाषाण को, जब अपना गर्व भी साथ न देता है,</span><br /> <span style="color: rgb(102, 0, 0);">बंद कमरे मे , आँखो से वक्ष पर उतरते,</span><br /> <span style="color: rgb(102, 0, 0);">वही आँसु पाषाण को फिर मोम बनाते हैं ।</span> </span><span style=""><o:p></o:p></span></p>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1114545504654446312005-04-27T01:23:00.001+05:302005-04-27T07:43:27.183+05:30मैं दुःखी करता हूँ न आपलोगों को ।<p style="color: rgb(102, 0, 0);" class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">माँ कहती हैं - बेटा दुनिया ऐसे ही दुःखी है , तुम्हारी दुख की कविताएँ या लेख उनके दुःखों को कम नहीं कर सकती है। भाग-दौङ के इस युग में जब लोग अपना बहुमूल्य समय में कुछ पढने को आएँ तो फिर दुःख भरे लेख उनको पढवाना उचित नहीं जान पढता है। </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(102, 0, 0);" class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">मैं थोङा-बहूत दुःखी करता होउँगा आपलोगों को, यह भी मैं जानता हूँ । युँ मैं भरसक कोशिश करता हूँ कि मेरे लेखों से पाठकों को दुःख न पहूँचे। फिर भी मेरे दर्द का व्रण नासुर ना बन जाए, सो दर्द को आप सबों के साथ बाँट लेता हूँ तो आराम महसुस होता है । </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(102, 0, 0);" class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">अर्जित ज्ञान, अनुभवों एवं उससे उत्पन्न विचारों में पारदर्शिता ही मुझे पसंद है । मेरे बारे में कहने को आप भी खुले मंच पर स्वतंत्र है । न कहना चाहें तो भी ठीक । </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(102, 0, 0);" class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">मतलब आपलोग जिसमें खुश वही सही , वरना मैं इंटरनेट पर लिखता क्यों, कागज की डायरी पर ही लिखा छोङ देता ।</span></p> <p class="MsoNormal"><span style="color: rgb(102, 0, 0);font-size:85%;" ><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">नोट </span><span style="">–</span></span><span style="color: rgb(102, 0, 0);font-family:Mangal;" lang="HI"><span style="font-size:85%;"> लिखते-लिखते यह इतना बङा हो गया कि कविता का भुमिका न होकर एक अलग लघु लेख बन गया।</span> </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;"> </span><span style=""><o:p></o:p></span></p>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1113542825631056962005-04-15T10:55:00.000+05:302005-04-15T19:44:31.833+05:30अनुगूंज 9 – ” आशा ही जीवन है | ”<p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">अनुनादजी <a href="http://www.akshargram.com/2005/04/14/408/">अनुगूँज का आयोजन</a> बङी आशा से कर रहे हैं कि बहुत सारे चिट्ठाकार इस विषय पर लिखेंगे। आप भी आशा लेकर मेरे चिट्ठे तक पहूँचे कि प्रेम भाई ने जरुर कुछ लिखा होगा । और इधर, आप मुझे भी पङना चाहेंगे, ऐसी ही थोङी-बहुत आशा से मैं भी लिख रहा हूँ । पहली बार चिट्ठाकार मंडली में प्रवेश के समय भी मैंने बङी आशा से आपसबों में एक स्थान माँगा । यह तो मेरा अहोभाग्य है कि मुझे सिर्फ आशानुरूप स्थान ही नहीं बल्कि आशातीत स्नेह भी मिला ।</span><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">आशा और प्रत्याशा का कोई भी रूप हो , सबका उद्देश्य किसी न किसी प्रकार की मानसिक शांति की प्राप्ति ही होता है । आशा किसकी, <span style="font-size:0;"></span>तो उत्तर होगा - किसी परिणाम की जो किसी मानसिक मरीचिका की भांति होता है । आज्ञा हो तो को चिट्ठाकारों में आध्यात्मिक चर्चा का एक अगरबत्ती जलाना चाहूँगा ।<span style="font-size:0;"> </span></span><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;"><span style="font-size:0;"></span>कर्मण्येवाधिकारेस्ते मा फलेषु कदाचन ।<br />- गीता, अध्याय -2, श्लोक </span><span style="font-size:0;">–</span><span lang="HI" style="font-family:Mangal;"> 47 </span><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">भावार्थ- प्राप्त कर्त्तव्यकर्मका पालन करने में ही तेरा अधिकार है । फल में तेरा अधिकार किञ्चित मात्र भी नहीं है। </span><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">तब क्या करें , फल की आशा करना छोङ दे । हर किसान बीज की बुआईकर आशा करना छोङ दे कि बोये बीज से नये पौधे होंगे । विद्यार्थी परिक्षा देकर पास करने की आशा छोङ दे । हमारे वर्तमान परिपेक्ष्य में कुछ जगह ही फल पर हमारे अधिकार नहीं <span style="font-size:0;"></span>होते हैं जैसे वोट देकर सही सरकार पाने की आशा या तो फिर पढ-लिखकर नौकरी पा जाने की आशा । फिर भी आशान्वित होकर कर्म किए जाते हैं। <span style="font-size:0;"></span></span><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;"><a href="http://www.akshargram.com/2005/04/14/408/"><img alt="Akshargram Anugunj" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" align="right" hspace="5" vspace="5" /></a> मुल बिन्दु पर चर्चा करें तो<span style="font-size:0;"> </span>हमारे दैनिक कार्यकलापों में हमारे अनुभव एवं किये गये कर्मों के आधार पर प्राकृतिक नियमों की आशा की ही जा सकती है । अब लिजिए जीवन की आशा हो या जीवन बीमा कंपनियों का आशाएँ , मृत्यु की जानकारी सबको है और मृत्यु के नाम पर धन का विपणन भी होता है । परन्तु दोनों पक्ष एक दुसरे से जीवन की ही आशा करतें हैं । </span><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">एक औसत मनुष्य के लिए आशा अगर एक तरूणी है तो निराशा बिन बुलाई भुतनी । पर अजीब सी स्थिति होती है जब तरूणी का संग छुङाकर अचानक यह भुतनी लिपटकर शोकसागर में तैरती रहती है । निराशा अगर अधम है तो, आशा उत्तम। अगर निष्काम कर्म कर सकें तो इन दोनों से मुक्ति मिल जाएगी । मगर आशारूपी तरूणी की चाह को कोई भला छोङ पाया है क्या । क्या देवों ने भी समुद्रमंथन के दौरान अमृत की आशा नहीं की होगी । </span><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">स्वपनद्रष्टा पुरूषार्थी भी आशान्वित होता है , उद्देश्य के प्रति । ऐसा नहीं कि उद्देश्य प्राप्ति की आशा और आनंद <span style="font-size:0;"></span>ही उसका ध्येय होता है । एक आशा की प्राप्ति या अप्राप्ति किसी दुसरे लघुतर या वृहत्तर किसी आशा का द्वार फिर खोलती है । असफलताओं के अंधकार में भी आशा के किसी दरवाजे को वह टटोलता रहता है । उसका विश्वास होता है कि ईश्वर सभी दरवाजे कभी नहीं बंद करता है । ऐसे व्यक्ति ही दूसरों के लिए आशा के किरण बनते हैं । आशा का एक दीपक दुसरे दीपों को भी प्रज्वलित करने में समर्थ होता है । </span><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal" style="color: rgb(0, 0, 102);"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">बचपन में माँ के गोद में चंदा मामा की ओर दिखाये गए अंगुलियाँ आशा के किरण ही जगाती है कि मानव मामाजी के गोद में जाने को बेताब हो जाता है । इतना ही नहीं आशा के बल पर वह मंगल चाचा जैसे अन्य परिचितों से मिलने के लिए अनजान उङाने भरता रहता है । कल्पना चावला की उङाने भी तो आशा की उङानें ही थी। इतिहास के पन्ने ताजे हो या भोजपत्र पर लिखे हो, अपनी सभ्यता - संस्कृति , कला-साहित्य या ज्ञान-विज्ञान की संपदा पर ही हम भविष्य की कुंडली के प्रति आशान्वित होते हैं। नवजात शिशु के प्रति भी भविष्य की मधुर आशाएँ तो की जा सकती है। साथ ही साथ विचारशील मनुष्य को अपने माता-पिता द्वारा की गयी आशाओं की याद दिलाकर कर्तव्यज्ञान का बोध भी कराती है । और इसी प्रकार आशा का एक तन्तु दुसरे से जुटता चला जाता है । </span><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p><p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;"><span style="color: rgb(0, 0, 102);">आशा हमेशा भविष्य से जुटा होता है जो कि अनिश्चितता से भरा है । किए गये कर्मों के आधार पर ही , स्वयं पर विश्वास रखकर सपने देखने को हर व्यक्ति स्वतंत्र है । मगर स्वपनों के यथार्थ में नहीं बदलने पर निराशा के आलिंगन में बँध जाना भी अनुचित जान पङता है । फिर तो क्षमताओं के आकलन के पश्चात्, इस छोटे से जीवन में, आशाओं के नये स्वपन गढना ही एक मात्र उपाय है ।</span> </span><span style="font-size:0;"><o:p></o:p></span></p>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1111804426205352652005-03-26T07:58:00.000+05:302005-03-26T14:53:43.676+05:30ब्लागर खेले होली रे भैया, ब्लागिन खेले होली हो<p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI"><span style="color: rgb(0, 153, 0);">होली है ... होली है ....</span><br /> <span style="color: rgb(0, 153, 0);">सारा रा रा रा रा होली है ....</span><br />अरे भैया, हमको आज रोको मत , हम नशे में हूँ । भर्चुअल भाँग की गोली खिला दी है रमणजी ने । मैं ज्यादा तो नहीं बोला न ।</span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">देवाशीषदा के यहाँ कौन नहीं जायगा आज, बताइये कौन नहीं जायगा , सब जाएगा, सब जाएगा । देवाशीषजी.... हमारी टोली आ रही है, रेडी रहिए। जब सब ब्लागर देवाशीषजी का असपेसल दही-बङे खायगा तो वहीं डेरा जमा लेगा। ओ भैया जीतूजी, एक गिलास आप भी पियो न, कमेंट भी तो करना है । इंद्रजी आसन से उतरो भैया, लो शिव का भांग पियो । कैसा लगा, नहीं पियोगे, हमारी बात समझ में नइखे आवेगी । स्वामीजी क्या हुआ, ध्यान तोङिए भाईसाब, हम भी तो जाने कि आज नशे का क्या रंग गेस किया है आपने। </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">बलागर दारु नही पीते, कभी नहीं पीते। आस्तिक </span><span style="">–</span><span style="font-family: Mangal;" lang="HI"> नास्तिक हम सब बस भर्चुअल भंगेरिये हैं,बस वही हमलोग आज पिये हैं। दारु का दो बोतल तो डांडी के समुन्दर किनारे मिला है, कुछ नमकहरामों ने जो पी छोङा था । खद्दरधारी मालिक तो फोटो खिंचवाकर निकल गये । बुरा मत मानों होली है । रतिजी बताइये तो जरा, ये भले घर के नेता पतंगे क्यों उङाते हैं । </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">अरुणजी, मेरे लिए दो भैया एक और ग्लास, प्लीज...., पी लेने दो पहली बार और अंतिम बार खाली आज भर। </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">अरे भैया आप जापान के कोने में क्यों बैठे हो, रंगों की पोटली तो खोल दिए कई दिन पहले से ही । हमको भी लगा दो न । सब हिन्दुस्तानी को एके धरम में रंग दो न । हाँ थोङा फुर्ती का भी रंग डाल दो, वही जापानी कलर । यहाँ सबको पुकार- पुकार कर अक्षरग्राम-अनुगूंज में बुलाना पङता है । थोङा आप भी लगा लो, आपका भी आलस्य खतम हो जाएगा । </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">मानोशीजी , एक गजल गाकर चुप क्यों हो गयीं आप । बांग्ला बुजेन तो । दोलेर एकटा गान करुन ना प्लीज । </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">ऐ लिजिए पंकजजी आ गये । इतना पकौङा, पंकजजी कौन खायगा इतना । वाह क्या खुब बने हैं।<br />आशीषजी , अतुलजी दिखा दिजिए ना उस दिन वाला ठुमका , मजा आ जाएगा । </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style=""><o:p> </o:p></span><span style="font-family: Mangal; color: rgb(204, 51, 204);" lang="HI">अरे वाह , क्या खुब<br />होली है ... होली है ...<br />बुरा मत मानो होली है ।</span><span style=""><o:p><span style="color: rgb(204, 51, 204);"> </span><br /></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">शैल भैया आप भी अनुप भैया के साथ क्या ग्लास लेकर वहाँ बैठे हो , यहाँ आओ बलागिंग होली है , लो रतिजी के यहाँ से आये हुए बङे खाओ । मानोशीजी के यहाँ से आये मालपुआ तो ज्यादातर रणवीरजी पहले ही साफ कर दिए हैं । </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">हो भाईलोग, टाईम केतना हुआ, देवाशीषदा के यहाँ जाना है कि नहीं। अब सब उठो रे भैया, हाथ पकङो , आशीषजी एक बार और लगाके वही ताल, हाँ मनीषजी बजाइये ना हरमुनियम मस्ती का ।</span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style=""><o:p> </o:p></span><span style="font-family: Mangal; color: rgb(0, 153, 0);" lang="HI">मोहन खेले होली रे भैया, राधा खेले होली हो ।<br />ग्वाला खेले होली रे भैया, ग्वालिन खेले होली हो ।<br />ब्लागर खेले होली रे भैया, ब्लागिन खेले होली हो ।<br />हमहें खेले होली रे भैया, <span style=""> </span>तुम्हें खेले होली हो ।</span><span style=""><o:p><span style="color: rgb(0, 153, 0);"> </span><br /></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">होली है ... होली है ... होली है ... </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p style="color: rgb(255, 0, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI"><o:p> </o:p></span></p>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1110979146634899732005-03-16T18:40:00.000+05:302005-03-18T11:20:17.623+05:30अनुगूंज 8 - शिक्षा: आज के परिपेक्ष्य में<p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">आशीषजी, शिक्षा के बारे में <a href="http://www.akshargram.com/2005/03/15/195/">चर्चा</a> प्रारंभ कर रहें है सो मैं भी शिक्षा के लिए भिक्षाटन को निकल पङा हूँ । यह तो हमें संस्कारों में मिल हुआ है न गुरूजी के आश्रम से।<span style=""> </span>नवोदय के गुरुजी ने सिखाया कि - बेटा प्रेम एक चीटीं को भी गुरुजी मान लेना चाहिए , सो मेरे जैसा मुढ इस मंत्र को गले के लाकेट में बांधकर घुमता रहता है । इधर कुछ महीनों पहले बलागिंग विधा भी सीख ली है । कभी नए-नए विचार दिमागी तंत्र को हिला देते है तो कभी आन-लाइन पढाई भी हो जाती है । मेरे चिट्ठाकार बंधुगण थोङा-बहुत ज्ञान मेरे झोली में भी डाल देते हैं।</span><code></code></p> <p class="MsoNormal"><code><img src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" alt="Akshargram Anugunj" align="right" hspace="5" vspace="5" /></code><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">बरामदे मे अभी एक सज्जन आए हैं। वे माँ के विद्यालय शिक्षा समिति के सचिव हैं, स्कुल के बच्चों को खिचङी खिलाना है न इसलिए सामान खरीदने जाना है । सरकार ने आदेश दे रखा है सो उसका अनुपालन सर्वोपरि<span style=""> </span>है ।<span style=""> </span>कितनी दूरदर्शी है हमारी सरकार , जिसे पता है कि भुखे पेट भजन न होए गोपाला । यही सरकार स्कुल चले हम का सुमधुर गीत सुनाकर नंग-धरंग बच्चों को बुला रही है । आओ बेटा आओ , हम जानते थे , तुम जरूर आओगे , पौष्टिक खिचङी की खुशबू जरुर पहुँची है , तुम्हारे झोपङी तक । </span><span style=""><o:p></o:p></span></p> <p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">एक दिन फिर सरकार ने स्कुल के नाम दो हजार का चेक भेज दिया एक पार्ट टाइम नारदजी के हाथों से, साथ मे कह गया कि इसी सप्ताह खर्चा करके रिपोर्ट जमा कराना है आफिस में । मगर अभी चेक जमा करने बैंक में कौन जाएगा । 200 विद्यार्थी पर दो शिक्षक , कौन खिचङी पकाने की निगरानी करेगा, कौन पिछला रिपोर्ट लिखेगा । 7वीं के बच्चे आज सोच रहे है कि हिन्दी की नया पाठ आज शुरू होगा । बाकी छह क्लासों के बच्चे तो आतुर हैं ही। आशीषजी, अगर कभी उन बच्चों के चेहरों को देखने का मौका मिले तो पता चलेगा कि उनका भुख खिचङी से ज्यादा नये रंगीन किताबों पर है । दुसरे शिक्षक पसीने से भींग रहे हैं उनको सम्हालने में । खैर दयालु सरकार का चेक आज ही जमा करना है । बैंक के पास में किताब की दुकान पर इतनी भीङ ।<span style=""> </span>सिनेमा हाल के सामने खङे रहने वाला दीपक आज किताब की दुकान पर । सुरज पश्चिम में कहीं उगा तो नहीं । पुछने पर पता चला की टीचर का बहाली होगा न , उसी का फारम निकला है । चलो अच्छा हुआ नये शिक्षकों की बहाली होने से काफी आराम हो जाएगा । मजे की बात है की बहाली की घोषणा और चुनाव की संभावना में गणितीय संबंध है । अब निश्चित हो सकते है कि दीपक को किसी पार्टी के कार्यकर्ता का मौसमी रोजगार मिल सकता है । इंटर पास है न सो सर्टिफिकेट का लेमिनेशन भी करा रखा है उसने । दादाजी के रटी रटाई बातों का अब उस पर असर नहीं होता है । उनको आठवीं पास करने पर बुलाकर नौकरी दी थी सरकार के बाबु ने । संस्कार<span style=""> </span>का असर तो संतति पर पङता ही है । भला परिवार का है दीपक सो दूसरे सहपाठी दोस्तों की तरह उसने अभी तक पुलिस की मार नहीं खाई है । मगर रेलवे की गैंगमैन की नौकरी के परिक्षाओं के सिलसिले में वह जुझारु पुरे भारत भुमि को निहार आया है । जब वह दिल्ली जा रहा था तब उसने दो एम.ए. पास लङको को भी उसी परीक्षा में शामिल होते जाते देखा था । एक बार आसाम के छात्रों नें उसे विदेशी शत्रु की तरह उसे मारा भी । मारने वाले छात्र भी आखिर नौकरी करना चाहते थे । बाहर के छात्र अगर घर की नौकरी ले लेंगे तो उनके छिलने के लिए प्याज भी कहाँ बचेगा ।<span style=""> </span>उग्रवाद का धंधा दिनोंदिन मंदा हो गया है ।<span style=""> </span>केबल टी.वी. के संस्कारी युवक छोटा-मोटा प्रेमभरा संसार चाहते है । प्रेयसी दहेजप्रथा के विपक्ष में प्रीतम समर्पित है । वे पान का दुकान खोल लें या गैरेज खोल लें, दो जुन की रोटी तो मिल ही जाएगी । तो सर्टिफिकेट का क्या होगा , हाँ दादाजी की तरह अपने पोते को दिखाऐंगे ।</span><span style=""><o:p><br /></o:p></span></p> <p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">पढते हो क्यों कमाने के लिए ,<br />कमाते हो क्यों,खाने के लिए ।</span><span style=""><o:p><br /></o:p></span></p> <p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">कमोवेश बात सही लगती है । पढो-पढो , शिक्षित बनों और देश को आगे बढाओ । मगर बेरोजगारों की दौड में, नौकरी की गारंटी, न बाबा न । दुसरा कोई भी धंघा या कारीगरी सिख लो , काम आ जाएगा । बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ तो खुब अच्छे लोगों के लिए है । अधिकतर प्रतिष्ठित संस्थानों से चुने हुए लोग हैं । राष्ट्र के सकल आय में वृद्धी तो जरूर करते है और साथ ही अपने शिक्षा का आंशिक उपयोग का मुक दर्शक बने रहते है । कुछ तो गुप्त नामों से बलागिंग भी करेंगे और सृजनात्मक लेखों में चुप्पी मारेंगे । कुछ दुसरे मधुशाला में जाकर टैक्स जमा करेंगे । उनसे तो भले 5 किलास तक पढा लिखा प्रवासी चुन्नीलाल है जो पंजाब के खेतों में मट्ठा पीकर बासमती उपजाता है । आपने उस दिन रेस्तरां में बिरियानी का जो आर्डर ग्रेजुएट बेयरे को दिया था न वह उसी बेजोङ बासमती चावल का बना था । बासमती के प्रसंग से आपको पेटेंट हनन का प्रसंग याद आ रहा होगा ।<span style=""> </span>हल्दी , नीम भी जुट गया न उस लिस्ट में । भाइयों हमारी ज्ञान संपदा की लिस्ट काफी लंबी है । बाकी धुंधली सुची देखना चाहते हैं या चाहते हैं कि विदेशी लोग पहले उस सुची को छान लें ।</span><span style=""><o:p><br /></o:p></span></p> <p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:Mangal;">धन्य है वे सपूत जो शिक्षा से मातृभुमि की ज्ञान संपदा एवं अन्न संपदा को बढा रहे हैं, और इसे सिरमौर राष्ट्र बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं । आशावादी दृष्टीकोण से अवश्य ही कह सकते हैं कि हम शिक्षित थे , हो रहें है और पूर्ण रुपेण हो भी जाऐंगे।<span style=""> </span>जरुरत है अपने अंदर के श्रोतों को जानने का और उनको सही दिशा देने का। मुझे तो शिक्षा का यही एक मात्र स्वरूप दिखता है ।</span></p>Prem Piyushnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1110593279022931342005-03-12T07:27:00.000+05:302005-03-12T07:37:59.026+05:30निःशुल्क बिन्दी ( फेविकोन) पाईए<p style="color: rgb(0, 102, 0);" class="MsoNormal"><span style="font-family: Mangal;" lang="HI">मेरे धैर्यशील पाठकों को देने को कुछ ज्यादा तो नहीं है परन्तु थोङी सेवा कर सकता हूँ ।</span><span style=""><o:p></o:p&