tag:blogger.com,1999:blog-10933538.post-1168935385302663232007-01-16T13:42:00.000+05:302007-01-16T13:47:40.500+05:30पुरूषार्थ और प्रेम<span style="color:#990000;">पुरूष कहलाने वाली एक काया के,<br />झुके कंधे और सशक्त छाती मध्य,<br />छिपा है, एक कोमल सा मुखड़ा,<br />विश्वस्त होंठ कुछ बुदबुदाते हैं ।<br /><br />फिर निःशब्द होंठ, आज गुँथ जाते हैं ।<br /><br />धीमे-धीमे बढ़ते उसके हाथें,<br />गुदगुदाती हूई फिर अंगुलियाँ,<br />श्यामल घटाओं के गजरों में,<br />दिशाहीन बस चलती जाती है।<br /><br />माथे चमकता, ध्रुव सुंदर दिखता है ।<br /><br />मुर्तिकार की थिरकती हैं अंगुलियाँ,<br />आभास कराती है, आज माटी को,<br />उसका अस्थित्व, उभरते आकार ।<br />जीवंत प्रतिमा - यही सत्य है, सुंदर है ।<br /><br />माटी - मुर्तिकार दोनों मोहित हैं ।<br /><br />अनोखी सृष्टि में दो दृष्टि,<br />वादियों में, उसके चंचल नयन,<br />उन पहाड़ियों के मध्य घाटी,<br />बस आज निहारा ही तो करती है ।<br /><br />मनुज मन आह्लादित हो जाता है ।<br /><br />चित्रकार की एक तुलिका,<br />इंद्रधनुषी थाली से रंग लिए,<br />स्पंदन का रंग भरती जाती है,<br />स्पष्ट दिखता तो, बस गुलाबी है,<br /><br />चित्रकार आज पुरष्कृत होता है ।<br /><br />जग को ज्ञान दान देने वाला पुरूष,<br />सारी कवित्व, विद्वता का पाठ भुलकर,<br />क्षणभर हेतु, ज्ञान के नवीन बंधन में,<br />कुछ अपरिभाषित पाठ पढ़ जाता है ।<br /><br />उसका ज्ञान पूर्ण यहीं होता है ।<br /><br />सावन की बाँसुरी सी प्रेरित,<br />मयूर की थिड़कन से कंपित,<br />तीन ताल के अनवरत पलटों तक,<br />शयामल घटाओं में अनुगंजन ।<br /><br />प्रेमभुमि यूँ अनुप्राणित होता है ।<br /><br />अनुशासित अश्वारोही का पराक्रम,<br />पाँच अश्वों का लयबद्ध चाल में,<br />अनुभूति की इस उद्विगन बेला मे,<br />समर्पित - फिर एक विजयी होता हे ।<br /><br />पुरूषार्थ फिर परिभाषित होता है ।</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10933538-116893538530266323?l=prempiyushhindi.blogspot.com'/></div>Prem Piyushnoreply@blogger.com1