10 फ़रवरी, 2005

कहो, क्यों रखा मेरा ये नाम ।

सहस्र नामों के शब्दकोष से,
इतनी चिंतन-मनन के पश्चात्,
स्वंय को आश्वस्त करने हेतु ही सही
कहो, क्यों रखा मेरा ये नाम ।

तुम्हारी आशा, किस प्रत्याशा में,
तुम्हारा निस्वार्थ, किस स्वार्थ में,
वर्णमाला से ढाई मोती चुनकर ही
कहो, क्यों रखा मेरा ये नाम ।

मानव सुलभ द्वैष का अधिकार,
पौरुष प्रतीक क्रोधी स्वभाव छिनकर,
अंतराग्नि को अश्रुघारा से शमन हेतु
कहो, क्यों रखा मेरा ये नाम ।

क्या उनके निर्मल प्रेम का प्रतीक,
या तुम्हारे प्रेम की आवश्यकता,
क्या जरुरत आन पङी थी तुझे
कहो, क्यों रखा मेरा ये नाम ।

अविश्वास के अदृश्य जटिल तंतुजाल,
में विस्तारित विचित्र दावानल के मघ्य,
असह्य तपित जीवन मे, दहन से पुर्व
कहो, क्यों रखा मेरा ये नाम ।

क्या स्वप्न देख रखे थे तुमनें,
क्या संकीर्ण स्वार्थ की घाटी से उपर,
किसी अप्राप्त उद्देश्य की अभिलाषिनी
कहो, क्यों रखा मेरा ये नाम ।

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