19 फ़रवरी, 2005

कुछ मीठी गोलियाँ होमियोपैथी की ।

मै कविता लिखता हूँ, जुगनू की चाह,
रोकर गाता हूँ , कंप्युटर पर वाह वाह,
बुलाकर सुनाता हूँ, जब तुम भागते हो,
यही अच्छा लगता है, हा..हा..हो..हो..।

लिखी एक बार बङी दुःख की कहानी,
याद नहीं की, थी वह बिलकुल जुबानी,
माँ कहती, दुखती दुनिया को दुखाते हो,
हँसना पङेगा अब मुझे, हा..हा..हो..हो..।

उन कवियों की तरह अंतरात्मा से,
मिट्टी बालु के किसी परमात्मा से,
धत् तेरे की, थोङे ही बात करता हूँ,
सब भ्रम है मेरे भाई , हा..हा..हो..हो..।

तुकबन्दी की कोशिश में, बेतुका गाता हूँ,
राग परिचय पढे बिना काम चलाता हूँ,
दिन दोपहर दफ्तर में भैरव सुनाता हूँ,
व्यस्त जीवन का सही राग, हा..हा..हो..हो..।

कौन भुसगोल है, कौन निरा मुर्ख,
किसकी छोटी आखें, किसकी है सुर्ख,
शहर के अंदेशे से दुबलाते क्यों हो,
संतुष्टि से जी लो, हा..हा..हो..हो..।

बङे दुःख के दबङे मे हो तुम दबे,
निराशा ने तेरे सारे द्वार बंद करे,
आ मुझसे मिल, सुनेगा मेरे दुखों को,
वजन हल्का लगेगा तुझे,हा..हा..हो..हो..।

बङी मुश्किल से मैं कविता बनाता हूँ,
थोङा लिखकर फिर ज्यादा मिटाता हूँ,
अरे, अभी तक होंठ चिपकाए बैठे हो,
गुदगुदी प्रुफ हो क्या, हा..हा..हो..हो..।

किसी गंभीर चिंता फिक्र में रमे हो तुम,
दाल रोटी जुगार में अगर हँसी हुई गुम,
हाथ दोनों उठा, अंगुलियाँ गालों पर रखो,
पीछे खींचों,अब सही हुआ, हा..हा..हो..हो..।

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