01 मार्च, 2005

मैं पास अभी सिर्फ शब्द हैं ।

जब मै अकेला हो जाता हूँ,
तुम साथी बनकर आते हो ।

जब अंधेरा छाने लगता है,
तुम दीपक एक जलाते हो ।

जब मन प्रश्न एक पुछता है,
प्रत्युत्तर तत्क्षण बताते हो ।

जब आत्मा कुछ माँगती है,
तुम गठरी खोलकर देते हो ।

जब उद्देश्यहीन मैं भटकता हूँ,
तुम दूर खङे होकर बुलाते हो ।

जब भ्रम कोई मन में होता है,
तुम सत्य का दर्शन कराते हो ।

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