15 अप्रैल, 2005

अनुगूंज 9 – ” आशा ही जीवन है | ”

अनुनादजी अनुगूँज का आयोजन बङी आशा से कर रहे हैं कि बहुत सारे चिट्ठाकार इस विषय पर लिखेंगे। आप भी आशा लेकर मेरे चिट्ठे तक पहूँचे कि प्रेम भाई ने जरुर कुछ लिखा होगा । और इधर, आप मुझे भी पङना चाहेंगे, ऐसी ही थोङी-बहुत आशा से मैं भी लिख रहा हूँ । पहली बार चिट्ठाकार मंडली में प्रवेश के समय भी मैंने बङी आशा से आपसबों में एक स्थान माँगा । यह तो मेरा अहोभाग्य है कि मुझे सिर्फ आशानुरूप स्थान ही नहीं बल्कि आशातीत स्नेह भी मिला ।

आशा और प्रत्याशा का कोई भी रूप हो , सबका उद्देश्य किसी न किसी प्रकार की मानसिक शांति की प्राप्ति ही होता है । आशा किसकी, तो उत्तर होगा - किसी परिणाम की जो किसी मानसिक मरीचिका की भांति होता है । आज्ञा हो तो को चिट्ठाकारों में आध्यात्मिक चर्चा का एक अगरबत्ती जलाना चाहूँगा ।

कर्मण्येवाधिकारेस्ते मा फलेषु कदाचन ।
- गीता, अध्याय -2, श्लोक
47

भावार्थ- प्राप्त कर्त्तव्यकर्मका पालन करने में ही तेरा अधिकार है । फल में तेरा अधिकार किञ्चित मात्र भी नहीं है।

तब क्या करें , फल की आशा करना छोङ दे । हर किसान बीज की बुआईकर आशा करना छोङ दे कि बोये बीज से नये पौधे होंगे । विद्यार्थी परिक्षा देकर पास करने की आशा छोङ दे । हमारे वर्तमान परिपेक्ष्य में कुछ जगह ही फल पर हमारे अधिकार नहीं होते हैं जैसे वोट देकर सही सरकार पाने की आशा या तो फिर पढ-लिखकर नौकरी पा जाने की आशा । फिर भी आशान्वित होकर कर्म किए जाते हैं।

Akshargram Anugunj मुल बिन्दु पर चर्चा करें तो हमारे दैनिक कार्यकलापों में हमारे अनुभव एवं किये गये कर्मों के आधार पर प्राकृतिक नियमों की आशा की ही जा सकती है । अब लिजिए जीवन की आशा हो या जीवन बीमा कंपनियों का आशाएँ , मृत्यु की जानकारी सबको है और मृत्यु के नाम पर धन का विपणन भी होता है । परन्तु दोनों पक्ष एक दुसरे से जीवन की ही आशा करतें हैं ।

एक औसत मनुष्य के लिए आशा अगर एक तरूणी है तो निराशा बिन बुलाई भुतनी । पर अजीब सी स्थिति होती है जब तरूणी का संग छुङाकर अचानक यह भुतनी लिपटकर शोकसागर में तैरती रहती है । निराशा अगर अधम है तो, आशा उत्तम। अगर निष्काम कर्म कर सकें तो इन दोनों से मुक्ति मिल जाएगी । मगर आशारूपी तरूणी की चाह को कोई भला छोङ पाया है क्या । क्या देवों ने भी समुद्रमंथन के दौरान अमृत की आशा नहीं की होगी ।

स्वपनद्रष्टा पुरूषार्थी भी आशान्वित होता है , उद्देश्य के प्रति । ऐसा नहीं कि उद्देश्य प्राप्ति की आशा और आनंद ही उसका ध्येय होता है । एक आशा की प्राप्ति या अप्राप्ति किसी दुसरे लघुतर या वृहत्तर किसी आशा का द्वार फिर खोलती है । असफलताओं के अंधकार में भी आशा के किसी दरवाजे को वह टटोलता रहता है । उसका विश्वास होता है कि ईश्वर सभी दरवाजे कभी नहीं बंद करता है । ऐसे व्यक्ति ही दूसरों के लिए आशा के किरण बनते हैं । आशा का एक दीपक दुसरे दीपों को भी प्रज्वलित करने में समर्थ होता है ।

बचपन में माँ के गोद में चंदा मामा की ओर दिखाये गए अंगुलियाँ आशा के किरण ही जगाती है कि मानव मामाजी के गोद में जाने को बेताब हो जाता है । इतना ही नहीं आशा के बल पर वह मंगल चाचा जैसे अन्य परिचितों से मिलने के लिए अनजान उङाने भरता रहता है । कल्पना चावला की उङाने भी तो आशा की उङानें ही थी। इतिहास के पन्ने ताजे हो या भोजपत्र पर लिखे हो, अपनी सभ्यता - संस्कृति , कला-साहित्य या ज्ञान-विज्ञान की संपदा पर ही हम भविष्य की कुंडली के प्रति आशान्वित होते हैं। नवजात शिशु के प्रति भी भविष्य की मधुर आशाएँ तो की जा सकती है। साथ ही साथ विचारशील मनुष्य को अपने माता-पिता द्वारा की गयी आशाओं की याद दिलाकर कर्तव्यज्ञान का बोध भी कराती है । और इसी प्रकार आशा का एक तन्तु दुसरे से जुटता चला जाता है ।

आशा हमेशा भविष्य से जुटा होता है जो कि अनिश्चितता से भरा है । किए गये कर्मों के आधार पर ही , स्वयं पर विश्वास रखकर सपने देखने को हर व्यक्ति स्वतंत्र है । मगर स्वपनों के यथार्थ में नहीं बदलने पर निराशा के आलिंगन में बँध जाना भी अनुचित जान पङता है । फिर तो क्षमताओं के आकलन के पश्चात्, इस छोटे से जीवन में, आशाओं के नये स्वपन गढना ही एक मात्र उपाय है ।

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