04 मार्च, 2005

मधुमक्खी

मधुमक्खी का एक छत्ता था ,
मधुघट वहाँ पर एक रक्खा था ।

पता नहीं कैसे आग लगी वहाँ,
खोने लगा फिर सबका जहां ।

सफेद मोम का दिखने लगा डेरा,
मगर छोङ न सके फिर वो बसेरा ।

मक्खी नहीं, सब डंक वाले मधुमक्खी,
फिर रसों से मधुघट भरते जाऐँगे ।

कोई स्वार्थ नहीं, मधु घानी चलाऐंगे ,
सब मिलकर गुँजनेवाला धुन गाऐंगे ।

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