02 मार्च, 2005

अनुगूँज ६: चमत्कार या संयोग ?

हमारे घर का वातावरण धार्मिक किस्म का है । टीन एज में नास्तिक बनने का मेरा जुझारु प्रयास टाँय-टाँय फिस्स हो गया था । जिनको आप अधिक चाहते है, उनसे ही झगङा भी ज्यादा होता है, वरना सङक के अजनबी से कौन झगङता है । माँ की चेतावनी सच हो गयी थी । काफी ठोकरें खाकर कुछ अज्ञात, अदृश्य सर्वशक्तिमान पर भरोसा हो गया । खैर मैं वो प्रसंग कहने जा रहा हूँ,जिसका मिलता जुलता शीर्षक अनुगूँज ने पहले ही दे रखा है ।

माँ अब बहुत कम ही उपवास रख पाती है । सरकारी स्कुलों की बढती जिम्मेदारियाँ और स्वास्थ्य की विवशताओं के कारण प्रभु से क्षमा प्रार्थना कर लेती है । फिर हमेशा की तरह , उस दिन उसने अपने अभीष्ट देवी की पुजा की। सुबह अभीष्ट देवी की पुजा कर वह तैयार होकर स्कुल जाने लगी । पुजा के बाद पहले प्रसाद गौ माता को देने की विधि है । समयाभाव के कारण पवित्र प्रसाद वह साथ ही लेकर स्कुल जाने लगी । चुँकि रास्ते में बहुत सारी गाऐं मिल जाती है , उन्हें प्रसाद खिलाकर फिर स्कुल में खुद प्रसाद ग्रहण करना चाहती थी । सो प्रसाद का डब्बा माँ अपने बैग में ले ली । उस दिन सुबह बारिश भी हुई थी इसलिए घर के सामने, सङक के किनारे थोङा पानी जमा हो गया था । एक गाय वहीं पर पानी पी रही थी । माँ उसके पास खङी हो गयी और उसके सिर उठाने का इंतजार करने लगी । मगर पानी पीकर वह फिर घास खाने लगी , इंतजार के बाद एक बार भी सिर नहीं उठाया । माँ दुखित हो गयी , क्योंकि घर से निकलते ही प्रथम अनुरोध अस्वीकार सा हो गया । निराश होकर वह आगे बढ चली, यह सोचकर कि किसी दुसरे गाय को खिला देगी । 10 -15 कदम बढी ही थी कि एक छोटा बछङा सामने आकर खङा हो गया । फिर अपने माथे से माँ के साथ खेलने लगा । पहले तो माँ ने उस बछङे को पुचकार कर अलग करना चाहा , मगर वो भी जिद्दी ही निकला । मेरे जैसे बछङे की माँ हो या उस बछङे की माँ , हरेक माँ को उपर वाले ने छठी ज्ञानेन्द्रिय दे रखी है । वह समझ गयी कि वह कुछ माँग रहा है , सो यह जानकर भी कि इतना छोटा बछङा नहीं खा सकता है , वह प्रसाद से एक दाना लेकर उसके मुँह में देने लगी । वो गाय जिसने पहले सिर नहीं उठाया था, उस बछङे की माँ थी । अब वो सब देख रही थी । बछङे को मेरी माँ के पास देखकर जल्दी- जल्दी गौ भी वहाँ पहूँच गयी । और सिर उठाकर वो भी शायद प्रसाद माँगने लगी । एक माँ की भाषा दुसरी माँ समझ गयी । प्रसाद खिलाते समय कुछ नीचे गिरे दाने को गौ ने देखा तक नहीं । बाकी प्रसाद गौ ने बङे प्रेम से खा लिया । गिरे हुए चने को माँ चुनकर फिर एक कागज में रख ली, धोकर खाने के लिए । शायद बछङे का अपना उद्देश्य प्राप्त हो गया था , सो वह दूर जाकर उछल रहा था । आखिर कभी कोई मुक जन्तु भी मनुष्य के मन की भाषा समझ सकता है क्या । कोई इसे संयोग कहे या आस्था या फिर दैवीय चमत्कार लेकिन जो कहा, वह सच है ।

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