27 अप्रैल, 2005

मैं दुःखी करता हूँ न आपलोगों को ।

माँ कहती हैं - बेटा दुनिया ऐसे ही दुःखी है , तुम्हारी दुख की कविताएँ या लेख उनके दुःखों को कम नहीं कर सकती है। भाग-दौङ के इस युग में जब लोग अपना बहुमूल्य समय में कुछ पढने को आएँ तो फिर दुःख भरे लेख उनको पढवाना उचित नहीं जान पढता है।

मैं थोङा-बहूत दुःखी करता होउँगा आपलोगों को, यह भी मैं जानता हूँ । युँ मैं भरसक कोशिश करता हूँ कि मेरे लेखों से पाठकों को दुःख न पहूँचे। फिर भी मेरे दर्द का व्रण नासुर ना बन जाए, सो दर्द को आप सबों के साथ बाँट लेता हूँ तो आराम महसुस होता है ।

अर्जित ज्ञान, अनुभवों एवं उससे उत्पन्न विचारों में पारदर्शिता ही मुझे पसंद है । मेरे बारे में कहने को आप भी खुले मंच पर स्वतंत्र है । न कहना चाहें तो भी ठीक ।

मतलब आपलोग जिसमें खुश वही सही , वरना मैं इंटरनेट पर लिखता क्यों, कागज की डायरी पर ही लिखा छोङ देता ।

नोट लिखते-लिखते यह इतना बङा हो गया कि कविता का भुमिका न होकर एक अलग लघु लेख बन गया।

1 टिप्पणी

At 5/04/2005 07:55:00 am, Blogger अनूप शुक्ला कहते हैं...

एतना अपराध बोध मत पालो बबुआ.लिखो हम बिना दुखी हुये पढ़ते हैं।

 

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