02 मई, 2005

गुरु दक्षिणा

एकलव्य सा सीखा है मैनें,
कलम एक दिन यहाँ पकङना,
शब्द बाणों में फिर धार करना,
पहले तरकश मेरी खाली थी ।

अपनी लेखनी की सुर्ख स्याही से,
तुम भरते जाना इन पन्नों को -
यही ज्ञानदा ने तुझसे कहलाया ,
जब कलम पहचान चाहती थी ।

सैकङों आँखों के इन पन्नों पर,
तथ्य, भावों के ज्ञान-सागर से,
चुने मैनें वे बिखराये मोती ही,
तुमने जो बारंबार छितराये थे ।

मैं भी जलाऊँ कुछ दीप यूँ ही,
और दक्षिणा में क्या दूँ मैं भी ।
या माँग ले मेरा अँगुठा फिर तू ,
द्रोणाचार्य ने कभी जो माँगा था ।

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